दरगाह में हुआ रूहानी समारोह 160वें उर्स में नसीरे मिल्लत के वलीअहद की दस्तारबंदी,
-महफ़िले सिमाअ में गूंजी मोहब्बत की सदाएँ
सीकर
सीकर जिले के फतेहपुर शेखावाटी में सूफी परंपराओं का एक ऐतिहासिक और दिल को छू लेने वाला मंज़र देखने को मिला। यहाँ आफताबे शेखावाटी की धरती पर हुजूर शहंशाहे विलायत ख्वाजा हाजी मुहम्मद नजमुद्दीन सुलैमानी फखरी निजामी चिश्ती अल्फारूकी रहमतुल्लाह अलैह के 160वें उर्स मुबारक के अवसर पर रूहानियत की ऐसी बहार आई कि अजमेर शरीफ की दरगाह और फतेहपुर की खानकाह एक सूत्र में बंध गए।
इस मौके पर शहजादा ए हुजूर गरीब नवाज, सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब जो स्वयं, दीवान साहब व सज्जादानशीन ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती (र.अ.) अजमेर शरीफ के जानशीन हैं – ने दरगाह पहुँचकर अजमेर दरगाह की तरफ़ से चादर पेश की और हुजूर नसीरे मिल्लत के जानशीन और वलीअहद (भावी सज्जादानशीन व मुतवल्ली) हज़रत पीर गुलामे नजम साहब नजमी सुलैमानी चिश्ती अल्फारूकी, जिनकी जानशीनी व सज्जादगी की घोषणा एक दिन पहले ही 7 अप्रैल को हुज़ूर नसीरे मिल्लत ने दरगाह शरीफ़ के ज़ाबते 1932 के अनुसार अपनी बैत ख़िलाफ़त व वसीयत के ज़रिए अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, उनकी दस्तारबंदी करते हुए उन्हें मुबारकबाद पेश की। यह दृश्य देखते ही बनता था दो रूहानी दरियाओं का संगम। वहीं दूसरी ओर, इस मौके पर सज्जादानशीन और मुतवल्ली हुज़ूर नसीरे मिल्लत पीर गुलाम नसीर साहब नजमी सुलैमानी चिश्ती अल्फ़ारूक़ी ने ख़ानक़ाहे आलिया नजमिया सुलैमानिया फ़ख़रिया निज़ामिया चिश्तिया बहिश्तिया फ़तेहपुर की ओर से हुजूर नसीरे मिल्लत ने अजमेर शरीफ़ से आए सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब और उनके साथ आए सभी मेहमानों की दस्तारबंदी की, उन्हें गुलपोशी से नवाज़ा और खैर मक़्दम करके उनका भव्य स्वागत किया। पूरी खानकाह श्रद्धालुओं से पटी रही। महफिले सिमाअ में कलामों ने दिल छू लिए और दस्तारबंदी की इस रस्म ने साबित कर दिया कि चिश्ती सिलसिले की मोहब्बत और सूफी विरासत आज भी जिंदा है, और फतेहपुर शेखावाटी इस रूहानी एकता का गवाह बना।