जयपुर
राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, सांस्कृतिक गौरव और मातृभाषा सम्मान के स्वर शनिवार को जयपुर स्थित विज्ञान पार्क सभागार में आयोजित भव्य पुस्तक विमोचन समारोह में एक साथ मुखरित हुए। शेखावाटी अंचल के सुप्रसिद्ध ग्राम काशी का बास निवासी वयोवृद्ध साहित्यकार श्री जगन्नाथसिंहजी कविया की तीन महत्वपूर्ण कृतियों — समझावणी, गीता मरूवाणी में तथा भगवत-भारती — के विमोचन अवसर पर राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग प्रमुखता से उठी।
समारोह साहित्य, संस्कृति और राजस्थानी अस्मिता के विराट उत्सव में परिवर्तित हो गया, जहाँ वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि राजस्थानी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की शौर्यगाथा, सांस्कृतिक विरासत, लोकजीवन और आध्यात्मिक चेतना की जीवंत संवाहिका है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान राज्य धरोहर संरक्षण प्रोन्नत्ति प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद श्री ओंकारसिंह लखावत ने की। मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार श्री लोकेशकुमारसिंह ‘साहिल’ उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेश विद्रोही, श्री जगदीशदान रतनू दासौड़ी, राव श्री शिवराजपालसिंह, श्री खेतसिंह राठौड़ तथा प्रांतीय चारण सभा के अध्यक्ष श्री नरेन्द्रसिंह कविया उपस्थित रहे।
तीनों पुस्तकों के विमोचन के पश्चात रचनाकार श्री जगन्नाथसिंहजी कविया का शॉल एवं साफा पहनाकर भव्य अभिनंदन किया गया। समारोह के आयोजक श्री आनन्दसिंह हाफावत ने सभी अतिथियों एवं आगंतुक महानुभावों का आत्मीय स्वागत किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री ओंकारसिंह लखावत ने कहा कि राजस्थानी भाषा राजस्थान की अस्मिता, गौरव और सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त आधार है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी साहित्य विश्व की किसी भी समृद्ध भाषा के साहित्य से कम नहीं है, फिर भी इसे आज तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आह्वान किया कि सभी राजस्थानवासियों को एकजुट होकर राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए “भागीरथ प्रयास” करने होंगे, अन्यथा राजस्थान की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर, लोक परंपराएँ और कीर्तिमान इतिहास धीरे-धीरे धूमिल होकर विलुप्ति की ओर बढ़ सकते हैं।
मुख्य अतिथि श्री लोकेशकुमारसिंह ‘साहिल’ ने कहा कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इतनी समृद्ध भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता न मिलना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा में लोकसंस्कृति, इतिहास, वीरता और संवेदनाओं का अनुपम संसार बसता है, जिसे संरक्षित करना समय की आवश्यकता है।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेश विद्रोही ने तीनों पुस्तकों की प्रकाशन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए रचनाकार की साहित्य साधना को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। वहीं बीकानेर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री जगदीशदान रतनू दासौड़ी ने अपने शोध-पत्र के माध्यम से श्री कवियाजी के समग्र रचना-कर्म का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनकी सृजन-साधना ईश्वर आराधना के समान है।
राव श्री शिवराजपालसिंह ने राजस्थानी साहित्य की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए भाषा मान्यता के प्रश्न को अत्यंत गंभीर बताया। वहीं श्री खेतसिंह राठौड़ ने राजस्थानी भाषा के माधुर्य, शौर्य और साहित्यिक गरिमा का उल्लेख करते हुए अधिकाधिक साहित्य सृजन की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का प्रभावशाली और काव्यात्मक संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद डॉ. गजादान चारण ने कहा कि हिन्दी का प्रथम महाकाव्य राजस्थानी में रचा गया तथा प्रथम महाकवि भी राजस्थान से ही संबंधित रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने से हिन्दी अथवा अन्य किसी भाषा को कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि भारतीय भाषाई संस्कृति और अधिक समृद्ध होगी।
समारोह में वक्ताओं ने राजस्थानी भाषा के गौरवशाली इतिहास पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा की जड़ें प्राचीन शौरसेनी प्राकृत और मरु-गुर्जर परंपरा में मिलती हैं। मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, मेवाती और ढूँढाड़ी जैसी बोलियाँ इसकी समृद्धि का प्रमाण हैं।
राजस्थानी साहित्य की डिंगल और पिंगल परंपरा का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि डिंगल शैली चारण कवियों की वीर रस प्रधान शैली रही है, जिसमें राजस्थान की रणभेरी, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत चित्रण मिलता है। “वेलि क्रिसण रुकमणी री” जैसी कालजयी कृति को “पांचवां वेद” और “उन्नीसवां पुराण” तक कहा गया है।
वक्ताओं ने महान कवि सूर्यमल्ल मीसण, आधुनिक साहित्य पुरोधा कन्हैयालाल सेठिया, लोक चेतना के अमर रचनाकार विजयदान देथा तथा राजस्थानी भाषा के “पाणिनी” कहे जाने वाले पद्मश्री सीताराम लालस के योगदान का भी उल्लेख किया। विशेष रूप से यह तथ्य रेखांकित किया गया कि सीताराम लालस द्वारा निर्मित 10 खंडों का “राजस्थानी शब्दकोश”, जिसमें दो लाख से अधिक शब्द संकलित हैं, विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय भाषा शब्दकोश माना जाता है। वक्ताओं ने इसे राजस्थानी भाषा की समृद्धि, वैज्ञानिकता और विशाल शब्द-संपदा का जीवंत प्रमाण बताया।
समारोह में यह भी कहा गया कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से केवल भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही नहीं होगा, बल्कि शिक्षा, शोध, साहित्य, पर्यटन, लोककला, प्रकाशन और रोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे। इससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, संस्कृति और ऐतिहासिक जड़ों से और अधिक मजबूती से जुड़ सकेगी।
कार्यक्रम में शेखावाटी, ढूंढाड़, मारवाड़ और बीकानेर सहित दूरदराज़ क्षेत्रों से आए अनेक गणमान्य साहित्यकार, कवि, समाजसेवी एवं भाषा प्रेमी उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से श्री कल्याणसिंह शेखावत, श्री कल्याणसिंह कविया, राजस्थान सूचना केन्द्र कोलकाता के सहायक निदेशक श्री हिंगलाजदान रतनू, शेखावाटी चारण महासभा के संस्थापक अध्यक्ष एवं समाजसेवी श्री अमरसिंह कविया, कवि श्री कैलाशदान कविया चेलासी सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। समारोह में मातृशक्ति की उल्लेखनीय उपस्थिति ने आयोजन को और अधिक गरिमामय बना दिया।
चारण सभा के अध्यक्ष श्री नरेन्द्रसिंह कविया ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया तथा आयोजक श्री आनन्दसिंह हाफावत ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
पूरे समारोह में राजस्थानी भाषा के सम्मान, संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों को लेकर गहरी आत्मीयता, सांस्कृतिक गौरव और संघर्ष की प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उपस्थित सभी महानुभावों ने यह विश्वास व्यक्त किया कि यदि राजस्थानवासी एकजुट होकर अपनी मातृभाषा के सम्मान हेतु संगठित प्रयास करेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थानी भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त करेगी और राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को नया संरक्षण एवं वैश्विक पहचान मिलेगी