मूवमेंट डिसऑर्डर और पार्किंसन: बिना डॉक्टरी सलाह के दवाइयों का सेवन करने से बढ़ सकता है खतरा…

अलवर और जयपुर के मरीजों ने साझा किया अनुभव, इलाज में मिली राहत

जयपुर में इंटरनेशनल मूवमेंट डिसऑर्डर डे (28 नवंबर) के मौके पर मूवमेंट डिसऑर्डर और पार्किंसन से लड़कर स्वस्थ हुए लोग एकत्र हुए। इस मौके पर मरीजों ने बताया कि कैसे उन्होंने बिना डॉक्टर की सलाह लिए दवाइयां खाईं, जिससे उनकी हालत और बिगड़ी।

सुरेंद्र माथुर की कहानी
जयपुर निवासी सुरेंद्र माथुर ने बताया कि 2014 में सिर में दर्द होने के बाद उन्होंने बिना डॉक्टर से परामर्श लिए पेन किलर की दवाइयां खानी शुरू की। 5 साल तक यह सिलसिला चलता रहा, लेकिन सिर दर्द में कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद डॉक्टर से जांच कराने पर पता चला कि उन्हें मूवमेंट डिसऑर्डर है। इलाज के लिए सिटी स्कैन, एमआरआई और बोटॉक्स इंजेक्शन दिए गए, जिससे उनकी हालत में सुधार हुआ। अब वे पहले की तरह भोजन चबा पाते हैं और सिर में माइग्रेन से भी राहत महसूस कर रहे हैं।

कृष्णा की कहानी
जयपुर के मालवीय नगर निवासी 68 वर्षीय कृष्णा ने बताया कि वह मूवमेंट डिसऑर्डर से 9 साल तक जूझती रहीं। शुरुआत में हाथों में कंपन था, फिर पांवों ने भी काम करना बंद कर दिया। कई न्यूरो सर्जन्स से इलाज कराने के बाद, आखिरकार 2023 में उन्हें डीबीएस (डीप ब्रेन स्टिमुलेशन) सर्जरी करने की सलाह दी गई, जिसके बाद उन्हें काफी राहत मिली और अब वे अपने से चलने में सक्षम हैं।

मूवमेंट डिसऑर्डर और पार्किंसन क्या हैं?
नारायणा हॉस्पिटल के डॉक्टर बलविंदर सिंह वालिया के अनुसार, मूवमेंट डिसऑर्डर और पार्किंसन दोनों बीमारियां एक जैसी हैं, लेकिन इनके लक्षण अलग होते हैं। मूवमेंट डिसऑर्डर में शरीर के मूवमेंट्स पर नियंत्रण नहीं रहता, जबकि पार्किंसन में मूवमेंट स्लो हो जाती है और हाथों में कंपन होने लगता है। इन बीमारियों का इलाज दवाइयों और सर्जिकल तकनीक, जैसे डीबीएस सर्जरी से किया जाता है, जो अब भारत के बड़े शहरों में उपलब्ध है।

Comments are closed.