नारी शक्ति वंदन अधिनियम : महिला अधिकारों से सशक्त लोकतंत्र और सशक्त राष्ट्र की ओर
सीकर
भारत का लोकतंत्र सदैव अपनी समावेशिता और विविधता के लिए जाना गया है, पर यह भी उतना ही सच है कि लंबे समय तक देश की आधी आबादी, महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया में अपेक्षित भागीदारी से वंचित रहीं। आज जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू होने की दिशा में ठोस पहल हुई है, तो यह केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के परिपक्व होने का प्रतीक है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पीछे यदि किसी नेतृत्व की स्पष्ट छाया दिखाई देती है, तो वह है नरेंद्र मोदी का दूरदर्शी और निर्णायक नेतृत्व। प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उन्होंने महिला सशक्तिकरण को केवल नारे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे नीति और क्रियान्वयन का आधार बनाया। बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला योजना, जनधन खातों में महिलाओं की भागीदारी, स्वच्छ भारत अभियान में महिलाओं की गरिमा, मातृत्व वंदना योजना, स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक बल ये सभी पहलें उसी सोच की कड़ियाँ हैं, जिनका स्वाभाविक विस्तार नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में सामने आया।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट किया कि महिलाओं को सशक्त करने का अर्थ केवल योजनाएँ देना नहीं, बल्कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया का सहभागी बनाना है। यह अधिनियम महिलाओं को राजनीतिक अधिकारों का वास्तविक अनुभव देगा। संसद और विधानसभाओं में उनकी बढ़ी हुई उपस्थिति से नीति निर्माण की दिशा बदलेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जल-संरक्षण, महिला सुरक्षा, सामाजिक न्याय और ग्रामीण विकास जैसे विषयों को नई प्राथमिकता मिलेगी। महिलाओं की भागीदारी केवल संख्या नहीं बढ़ाएगी, बल्कि निर्णयों में संवेदनशीलता और दीर्घकालिक दृष्टि भी जोड़ेगी।
स्वतंत्रता के बाद संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार दिए, मतदान का अधिकार मिला, शिक्षा और रोजगार के अवसर खुले, पर राजनीति के ऊँचे मंचों तक पहुँच अब भी सीमित रही। पंचायत और स्थानीय निकायों में आरक्षण से यह सिद्ध हुआ कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे न केवल भागीदारी निभाती हैं बल्कि संवेदनशील, पारदर्शी और जनोन्मुखी नेतृत्व भी देती हैं। इसी अनुभव की स्वाभाविक अगली कड़ी है, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण।
यह अधिनियम महिलाओं को अनुग्रह नहीं, उनका अधिकार दिलाने की पहल है। आज महिलाएँ खेत से लेकर फैक्ट्री, प्रयोगशाला से लेकर अंतरिक्ष, सेना से लेकर स्टार्टअप तक हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर चुकी हैं। फिर संसद और विधानसभा जैसे नीति-निर्माण के केंद्रों में उनकी संख्या सीमित क्यों रहे? लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जिस समाज के लिए नीतियाँ बनें, उसकी वास्तविक तस्वीर नीति-निर्माताओं में भी दिखे।
यह अधिनियम आने वाले समय में राजनीति की भाषा और दिशा दोनों बदल सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जल, स्वच्छता, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को नीति निर्माण में नई प्राथमिकता मिलेगी। महिलाओं की भागीदारी केवल संख्या नहीं बढ़ाएगी, बल्कि निर्णयों की गुणवत्ता और दृष्टि को भी व्यापक बनाएगी।
महत्वपूर्ण यह भी है कि यह विषय किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का दायित्व है। लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जब वह समाज के हर वर्ग की आवाज़ को समान रूप से स्थान दे। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी लोकतांत्रिक भावना को सशक्त करता है। नारी शक्ति का सशक्तिकरण किसी एक दिन या एक कानून से पूरा नहीं होगा, पर यह अधिनियम उस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। यह संदेश स्पष्ट है, भारत का भविष्य तब और उज्ज्वल होगा, जब उसकी आधी आबादी निर्णय की मेज़ पर आधी हिस्सेदारी के साथ बैठेगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का महत्व केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है। यह भविष्य की राजनीति को अधिक समावेशी, संतुलित और जनोन्मुखी बनाने की आधारशिला है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में यह पहल उस विश्वास को मजबूत करती है कि जब महिलाएँ आगे बढ़ेंगी, तो देश स्वतः आगे बढ़ेगा। अंततः नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह केवल कानून नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का प्रतीक है। जहाँ महिलाएँ नेतृत्व की प्रतीक नहीं, बल्कि नेतृत्व की धुरी होंगी। यही सशक्त भारत की सच्ची परिभाषा है।
नीलम मिश्रा
पूर्व प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भाजपा राजस्थान